पंजाब पुलिस द्वारा विक्रम मजीठिया की गिरफ्तारी के बाद Lt Col (सेवानिवृत्त) गुरपकाश सिंह विरक ने उठाई आवाज, सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील
मोहाली,भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल गुरपकाश सिंह विरक ने देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट से एक गंभीर मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेने की मांग की है। उन्होंने हाल ही में पंजाब पुलिस द्वारा सादी वर्दी में की गई कार्रवाई, विशेष रूप से **राजनेता विक्रम मजीठिया की गिरफ्तारी को आधार बनाते हुए इसे कानून व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया।

Lt Col (सेवानिवृत्त) गुरपकाश सिंह विरक ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को एक औपचारिक पत्र भेजते हुए मांग की है कि पुलिस और अन्य सुरक्षाबलों को सिविल ड्रेस में किसी भी प्रकार की सार्वजनिक कार्रवाई (गिरफ्तारी, छापा, पूछताछ आदि) से रोका जाए। उन्होंने चेताया कि इस प्रकार की कार्रवाई नागरिकों में भय, भ्रम और असुरक्षा का माहौल पैदा करती है तथा इसे राज्यप्राय गुंडागर्दी” की संज्ञा दी।
पूर्व सैन्य अधिकारी ने इस पत्र में छह प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया:
1. राज्य के नाम पर अराजकता – जब सादी वर्दी में कार्रवाई होती है, तो यह भीड़ तंत्र जैसा प्रतीत होता है।
2. जनता में भ्रम और खतरा – आम लोग नहीं पहचान पाते कि हमला करने वाले पुलिस हैं या अपराधी।
3. गुप्तचर एजेंसियों की भूमिका सीमित हो – केवल खुफिया एकत्र करने तक सीमित रखें, कार्रवाई की इजाज़त न हो।
4. वीआईपी सुरक्षा में भी पारदर्शिता हो – सुरक्षा गार्डों को भी पहचान योग्य यूनिफॉर्म पहनना चाहिए।
5. परिवारों पर मानसिक प्रभाव– लाइव रेड्स या गिरफ्तारी से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों में दहशत फैलती है।
6. कानूनी अस्पष्टता और विश्वास का संकट – लोकतंत्र में हर कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।
Lt Col विरक ने आग्रह किया कि सुप्रीम कोर्ट:
सादी वर्दी में पुलिस कार्रवाई पर रोक लगाए,
हर सार्वजनिक ऑपरेशन में पूर्ण वर्दी और पहचान पत्र अनिवार्य करे,
गृह मंत्रालय व राज्य सरकारों को SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) लागू करने का निर्देश दे,
हाल के ऐसे सभी मामलों की समीक्षा कर कानूनी और अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करे।
Lt Col विरक का कहना है कि “देश के कानून प्रवर्तन तंत्र की गरिमा, नागरिकों की सुरक्षा और वर्दीधारी सेवाओं की प्रतिष्ठा” दांव पर है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को इस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर राष्ट्रव्यापी दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।

