“तानाशाही का नया ठिकाना: MCD- दिल्ली नगर निगम की स्टैंडिंग् कमेटी के सभागार से बाहर निकाले पत्रकार! सिविक सेंटर में लगा आपातकाल
संदीप शर्मा
ढाई साल बाद MCD की नवगठित स्टैंडिंग कमेटी की बैठक बुलाई गई, और लोकतंत्र की कसम खाने वालों ने सबसे पहले लोकतंत्र के चौथे खंभे को ही धराशायी कर दिया — जी हां, मीडिया को! पत्रकारों को ऐसा ट्रीटमेंट मिला जिसकी उन्हें उम्मीद न थी ।

अब भला बताइए, प्रेस विभाग खुद न्यौता भेजे और फिर दरवाजे पर “नो एंट्री फॉर मीडिया” का बोर्ड लगा दे — ये क्या बात हुई ?
पत्रकारों को सभागर से लौटा दिया गया कि नीचे प्रेसरूम में जाकर बैठे । ऐसा इतिहास में पहले तो कभी नही हुआ । पत्रकारों ने एक स्वर में इस तुगलकी फरमान का विरोध किया और बैठक कवर न करने का निर्णय लिया ।
मीडिया के मित्रों से कहना चाहता हूं कि यह सब एकएक नहीं हुआ, इसकी स्क्रिप्ट पहले से लिखी जा चुकी थी, जिसमें नायिका बेशक चेयरपर्सन सत्या शर्मा बताई जा रही हैं,लेकिन इसके निर्माता-निर्देशक प्रदेश भाजपा के अंदर किसी बंद कमरे में छिपे बैठे हैं । सूत्रों की माने तो मीडिया प्रवेश पर रोक का निर्णय एकएक नहीं बल्कि पूर्व नियोजित था जिसमे निगम के सत्ताधारी दल के साथ साथ निगम के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों की भी सहमति थी ।
भाजपा को भी अब ‘फ्री प्रेस’ से एलर्जी हो गई है!
हर साल जून में इंदिरा गांधी को तानाशाह घोषित करने पर भाषण दे देकर जिनका गला सूखने लगाते हैं, उन्हें भी अब प्रेस की आज़ादी खल रही हैं । प्रेस की आज़ादी पर भाषण देने वालों को अब कलम और कैमरे से एलर्जी होने लगी है ।
अब सवाल ये है: छुपाना क्या चाहते हैं?
अगर सभागार में मीटिंग की कार्यवाही में पारदर्शिता है और स्टैंडिंग् कमेटी के 18 सदस्य,सब दूध के धुले हैं तो कैमरे से परहेज़ क्यों? कैमरे को अंदर जाने दो, जनता देखे कि किस तरह से विकास की योजनाओं पर बहस होती है या किस तरह से एजेंडे में शामिल आइटमस को पास किया जाता है ।
AAP भी दूध की धुली नहीं थी
2022 में AAP ने भी यही किया। मीडिया के नाम पर सिर्फ ‘चहेते पत्रकार’ मेयर कार्यालय में प्रवेश पा सकते थे, बाकी बाहर मेयर साहिबा के वेटिंग रूम में आधा एक घन्टा बैठकर और यह सुनकर आ जाया करते थे की मेयर मैडम मीटिंग में हैं, आज नहीं मिल पाएंगी। यह नया दौर था जब मेयर दफ्तर मेटल डिटेक्टर से घिरा हुआ था — जैसे पत्रकार बम लेकर आते हों, कैमरा नहीं।
AAP हो या BJP या फिर कभी-कभी जगने वाली कांग्रेस —
इन सभी को मीडिया से डर क्यों लगता है?
क्या मीडिया का सवाल पूछना, कटाक्ष करना या पोल खोलना नेताओं के लिए इतना असहनीय हो गया है?
अरे भई नेता जी, आलोचना तो लोकतंत्र की ऑक्सीजन होती है!
जो सरकारें सवालों से भागती हैं, उन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता। कैमरा बंद करने से बदनामी नहीं रुकती, बल्कि यह सन्देश जाता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ है।
पारदर्शिता का राग गाने वाले, जब अंधेरों में फैसले लेने लगें, तो समझिए लोकतंत्र का बल्ब फ्यूज हो गया है।
सत्ताधारी पार्टियों को समझना चाहिए कि पत्रकारों को बाहर रखकर आप केवल अपनी ही नाकामी का प्रदर्शन कर रहे हैं — और हां, जनता सब देख रही है,।
तो अगली बार जब प्रेस को रोका जाए, समझ लीजिए कि सच दरवाजे पर खड़ा है — और अंदर बैठे लोग उससे डर रहे हैं।
वहीं प्रेस के मित्रों को भी थोड़ा गिरेबां में झांकने की ज़रूरत है कि आखिरकार पत्रकारिता और पत्रकार का वक़ार क्यों गिर रहा है।

