हथियार गिनते हुए, सैनिकों को नज़रअंदाज़ करते हुएकैसे रक्षा बजट भारत की सबसे बड़ी ताकत—सैनिक—को अनदेखा करता है

भारत की रक्षा शक्ति को अक्सर आँकड़ों से मापा जाता है—कितना बजट बढ़ा, कितने नए हथियार आए, कौन-सी मिसाइल या विमान शामिल हुआ। लेकिन इस गणना में एक मूल प्रश्न गायब है—सैनिक का भविष्य और मनोबल।

हम खर्च गिनते हैं, प्रतिबद्धता नहीं;मशीनें देखते हैं, मनुष्य नहीं;और तकनीक में निवेश करते हैं, पर मानव संसाधन को बोझ मानते हैं।

इस सोच को संविधान का अनुच्छेद 33 संस्थागत रूप से मज़बूत करता है। अनुशासन के नाम पर सैनिकों के मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए—उद्देश्य सही था, पर परिणाम यह निकला कि एक ऐसा वर्दीधारी वर्ग बना जो संगठित रूप से अपनी पेंशन, पुनर्वास और सम्मान पर सवाल नहीं उठा सकता। जब सैनिक की आवाज़ सीमित हो, तब नैतिक ज़िम्मेदारी पूरी तरह राज्य की होती है—और यहीं चूक हुई है।
शॉर्ट सर्विस कमीशंड सैनिकों (SSCOs) के साथ हुआ अन्याय इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

Army Instruction 11/S/64 में कहा गया—
“पेंशन विचाराधीन है; आदेश अलग से जारी किए जाएंगे।”
वे आदेश 64 वर्षों तक जारी ही नहीं हुए। हज़ारों सैनिक बिना पेंशन और ठोस पुनर्वास के सेवा से मुक्त कर दिए गए। यह प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि लम्बे समय से चला आ रहा नीतिगत अन्याय है।

OROP का उद्देश्य समानता और सम्मान था, लेकिन मनमानी कट-ऑफ तारीखों और औसत आधारित पेंशन ने सैन्य रैंकों की गरिमा को ही कमजोर किया।
अग्निवीर योजना ने इस प्रवृत्ति को और आगे बढ़ाया—बिना पेंशन, बिना व्यापक पुनर्वास कानून, सैनिक को अस्थायी मानव संसाधन में बदल दिया गया।

भारत के पास आज भी Armed Forces Resettlement & Welfare Act नहीं है। बजट कागज़ों पर संतुलित दिखता है, लेकिन सैनिक की असुरक्षा बैलेंस शीट से बाहर रहती है।

जो बजट हथियारों को प्राथमिकता देता है और सैनिक को पीछे छोड़ देता है, वह संसद में प्रभावशाली लग सकता है—पर सीमाओं पर कमजोर साबित होता है।
राष्ट्र सैनिक के बिना सुरक्षित नहीं, और सैनिक सम्मान के बिना।

जय हिंद 🇮🇳

लेखकलेफ्टिनेंट कर्नल गुरपकाश सिंह विर्क (से.नि.)

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