दिल्ली भाजपा में बदलाव: हर्ष मल्होत्रा की ताजपोशी, वीरेंद्र सचदेवा की विदाई के राजनीतिक मायने
संदीप शर्मा
दिल्ली भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर पिछले कई महीनों से चल रही अटकलों पर आखिरकार विराम लग गया। गुरुवार को पार्टी नेतृत्व ने केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। लंबे समय से चल रही चर्चाओं और संभावित नामों में हर्ष मल्होत्रा का नाम सबसे आगे माना जा रहा था और अंततः वही पार्टी नेतृत्व की पहली पसंद साबित हुए। दिल्ली की राजनीति पर नजर रखने वाले सियासी जानकारों का अनुमान इस बार पूरी तरह सही बैठा।

भाजपा में पिछले कुछ वर्षों में संगठनात्मक फैसले अक्सर चौंकाने वाले रहे हैं। कई बार ऐसे नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं जिनके नाम की पहले कोई चर्चा तक नहीं होती थी। मोदी-शाह युग में भाजपा ने कई बड़े दिग्गज नेताओं को किनारे कर नए चेहरों को आगे बढ़ाया। भाजपा का यही अंदाज उसे अन्य दलों से अलग बनाता है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के नाम की भी पहले कोई चर्चा नहीं थी। इसी तरह वीरेंद्र सचदेवा को भी पहले कार्यकारी अध्यक्ष और बाद में पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने सबको चौंका दिया था। सचदेवा ने भी बेहतरीन पारी खेलकर शीर्ष नेतृत्व को निराश नहीं किया और शानदार प्रदर्शन किया। वहीं दिल्ली भाजपा अध्यक्ष के मामले में हर्ष मल्होत्रा को लेकर चल रही चर्चाएं सच साबित हुईं और उन्हें अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे दी गई ।

हर्ष मल्होत्रा की संघ और संगठन दोनों पर पकड़ मजबूत मानी जाती है। वह भाजपा संगठन में महासचिव सहित कई अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। वर्ष 2012 में निगम पार्षद बनने के बाद उन्होंने शिक्षा समिति अध्यक्ष और पूर्वी दिल्ली के महापौर के रूप में भी काम किया। 2024 में पूर्वी दिल्ली से सांसद चुने जाने के बाद उन्हें केंद्र सरकार में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। इससे साफ है कि पार्टी नेतृत्व का उन पर पूरा भरोसा है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी वीरेंद्र सचदेवा और हर्ष मल्होत्रा दोनों टिकट के दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन उस समय भी बाजी हर्ष मल्होत्रा ने ही मारी थी। हर्ष मल्होत्रा व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं, ज़्यादा तामझाम और दिखावे से दूर ही रहते हैं ।

गुरुवार को दिल्ली भाजपा कार्यालय में नए अध्यक्ष की ताजपोशी के दौरान भारी उत्साह देखने को मिला। डीडीयू मार्ग स्थित पार्टी कार्यालय कार्यकर्ताओं और नेताओं की भीड़ से खचाखच भरा दिखाई दिया। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, सांसदों, विधायकों, निगम पार्षदों और विभिन्न मोर्चों के पदाधिकारियों की मौजूदगी ने पार्टी कार्यलय को गुलज़ार कर दिया। वीरेंद्र सचदेवा ने औपचारिक रूप से हर्ष मल्होत्रा को जिम्मेदारी सौंपी। भाजपा की खासियत यही मानी जाती है कि पार्टी नेतृत्व समय रहते नए विकल्प तैयार रखता है और दिल्ली के लिए हर्ष मल्होत्रा को बेहतर विकल्प के रूप में देखा गया।
वीरेंद्र सचदेवा को क्यों नही मिला दुबारा मौका-
अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर वीरेंद्र सचदेवा को दोबारा मौका क्यों नहीं मिला। जबकि उनके नेतृत्व में भाजपा ने 27 साल बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर सत्ता हासिल की। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटों पर जीत का परचम लहराया । इतना ही नहीं, आम आदमी पार्टी के भीतर राजनीतिक समीकरणों का फायदा उठाकर भाजपा ने निगम में भी अपना मेयर बनाने में सफलता हासिल की। सचदेवा की सियासी रणनीति ने AAP पार्टी को निगम में तीन गुटों में बांट दिया । एक गुट को भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया तो दूसरे अच्छा को इंद्रप्रस्थ विकास पार्टी के रूप में खड़ा कर दिया। यह दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल को बड़े झटके के रूप में देखा जा सकता है । इन तमाम बड़ी उपलब्धियों का बड़ा श्रेय वीरेंद्र सचदेवा को दिया जाता है।
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो वीरेंद्र सचदेवा को दोबारा अध्यक्ष न बनाए जाने की सबसे बड़ी वजह मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ उनके रिश्तों में दूरी मानी जा रही है। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री उन्हें फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में नहीं थीं। निगम राजनीति के दौरान दोनों नेताओं के बीच बने कुछ निजी और राजनीतिक मतभेद भी इसकी वजह बताए जाते हैं। इसके अलावा दिल्ली के कुछ सांसदों का भी सचदेवा को पूरा समर्थन नहीं मिल पाया। कई सांसद खुद भी अध्यक्ष पद की दौड़ में सक्रिय बताए जा रहे थे। ऐसे में मुख्यमंत्री और सांसदों के विरोध ने भी सचदेवा की राह मुश्किल कर दी।
पार्टी के भीतर यह चर्चा भी रही कि अप्रत्याशित सफलताओं के बाद वीरेंद्र सचदेवा के व्यवहार और कार्यशैली से कुछ नेता असहज महसूस करने लगे थे। हालांकि उनके करीबी नेताओं का कहना है कि उनके स्वभाव में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, लेकिन संगठन के कुछ नेताओं की नाराजगी की चर्चाएं जरूर सामने आती रहीं।
अब सवाल यह है कि क्या पार्टी वीरेंद्र सचदेवा को पूरी तरह किनारे कर देगी? इसकी संभावना बेहद कम दिखाई देती है। उनके कार्यकाल की उपलब्धियों को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। हालांकि भाजपा में जीत का सबसे बड़ा श्रेय अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व को ही मिलता है, लेकिन संगठन में सक्रिय नेताओं को भविष्य में नई जिम्मेदारियां भी दी जाती रही हैं।

संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में बनने वाली भाजपा की राष्ट्रीय टीम में वीरेंद्र सचदेवा को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी, किसी राज्य का प्रभारी या सह-प्रभारी बनाया जा सकता है। वहीं राज्यसभा की संभावना भी पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा रही, हालांकि दिल्ली कोटे से इसके लिए उन्हें 2027 तक इंतजार करना पड़ सकता है। तब तक गंगा से कितना पानी बह जाएगा कौन जानता है, ये तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करेगा ।
फिलहाल पूर्व अध्यक्ष आदेश गुप्ता की तरह भाजपा संगठन में वीरेंद्र सचदेवा की राजनीतिक भूमिका समाप्त हो जाएगी,ऐसा मानना गलत होगा । सचदेवा जहां सियासी शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं वहीं वह एक तीरंदाज भी है । राजनीति में अनुभवी तीरंदाज कभी खाली तरकश लेकर नहीं चलते और सचदेवा के तरकश में अभी भी कई तीर हैं ,देखना होगा कि क्या इस बार उनका तीर सही निशाने पर बैठता है ।

