MCD कमिश्नर की फटकार बेचारे निगम पार्षद लाचार,निगम में बाबुशाही की बहार
संदीप शर्मा
दिल्ली नगर निगम की स्थाई समिति की बैठक मंगलवार को अचानक हंगामेदार हो गई । हंगामा सत्तापक्ष और विपक्ष में नहीं बल्कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों और बाबुशाही में हुआ । इस हंगामे में बाबुशाही ने बाजी मारी और चुने हुए पार्षदों को बता दिया कि भाई लोगो निगम में हमारी ही तूती बोलेगी,तुम्हारी कोई औकात नहीं ।

भाजपा पार्षद पंकज लूथरा ने बैठक में आरोप लगाया कि दिल्ली में अवैध निर्माण धड़ल्ले से चल रहा है। उनके पड़ोस के वार्ड में एक बजुर्ग व्यक्ति ने बाकायदा 2 लाख 78 हज़ार खर्चा कर नक्शा पास करवाया,बावजूद इसके उन्हें परेशान किया जा रहा है । जबकि जो लोग निगम अधिकारियों की जेब गर्म करते हैं, उनके द्वारा किए जाने वाले अवैध निर्माण पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

लूथरा ने एक बुजुर्ग शख्स का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी बिल्डिंग का नक्शा पास था,
सिर्फ शाफ्ट की चौड़ाई 2.5 फीट की बजाय 1.5 फीट रखी गई ।अब निगम उसके खिलाफ डेमोलिशन की कार्रवाई कर रहा है।
जब बुजुर्ग ने (जूनियर इंजीनियर)जे.ई मोहित कालरा से बात की, तो उसने 3 लाख की मांग की।
बुजुर्ग ने 2 लाख देने की बात कही, जिस पर जेई का जवाब था —डीसी साहब (बादल कुमार) को भी हिस्सा देना होता है ।
पंकज लूथरा ने कहा मैंने जीई की शिकायत के लिए DC साहब को कई बार फोन किये लेकिन यह फोन उठाते ही नहीं हैं । जी.ई मनमानी पर उतारू है,क्या करें । वो कहता है मेरी DC से सीधी सेटिंग है । उनको भी हिस्सा जाता है ।
बैठक में जब पंकज लूथरा ने यह आरोप लगाए, तो डीसी बादल कुमार गरजने लगे।
उन्होंने कहा — “यह आरोप सरासर गलत हैं, मेरा और पार्षद का फोन चेक कर लीजिए। अगर मैंने फोन नहीं उठाया, तो क्या इसका मतलब यह है कि मैं दोषी हूं?” इन्होंने मुझे सिर्फ एक बार फोन किया । इनका और मेरे फोन की कॉल डिटेल चेक की जाए।
DC बादल ने गरजते हुए पलटवार किया कि “हो सकता है इन्हीं ( पंकज लूथरा,निगम पार्षद ) का भी इसमें शेयर हो।”
इसके बाद समिति अध्यक्ष सत्य शर्मा ने डीसी बादल को फटकार लगाई कि वह चुने हुए जनप्रतिनिधि से इस तरह बात नहीं कर सकते।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का असली क्लाइमेक्स तब आया, जब निगम आयुक्त अश्विनी कुमार ने एंट्री ली।
सभी को लगा कि अब आयुक्त अपने अफसर को फटकारेंगे। लेकिन हुआ उल्टा —
आयुक्त ने तो चुने हुए जनप्रतिनिधियों की पूरी क्लास लगा दी। उन्होंने कहा —
“हमारा ऑफिसर सुनता रहेगा और आप उस पर गलत आरोप लगाते रहेंगे — ये नहीं चलेगा। अगर इज़्ज़त आपकी है, तो अधिकारी की भी है। ” अगर कोई प्रमाण है तो लाइए, लेकिन निराधार आरोप लगाए जाएं यह नहीं चलेगा । क्या चल रहा है यह सिर्फ ब्लैकमेलिंग और एक्सटॉर्शन-
और फिर अंग्रेज़ी में प्रवचन दिया —
“*Do not become tool in the hands of blackmailers.*
शर्म आनी चाहिए आपको,यह हो क्या रहा है । हम यहां काम करने आते हैं लफंगई करने नहीं ।
निगमायुक्त का यह रवैया देखकर सब आवाक रह गए । पूरी सभा एक क्लास में तब्दील हो गई और निगमायुक्त एक टीचर की भूमिका में ज्ञान पेलते दिखाई दिए । सत्ता पक्ष और विपक्ष के निगम पार्षद अच्छे बच्चों की तरह ज्ञान सुन रहे थे । सभा कक्ष में पिन ड्राप साइलेंस थी ।
बादल साहब मन ही मन मुस्करा रहे थे । वाह बॉस हो तो ऐसा ! उधर लूथरा का मुंह लटक गया था । बेचारे लूथरा साहब को बुरी तरह से पेल दिया गया था । सत्या शर्मा सत्य की शांत मूर्त बनकर बैठी थी । अपने निगम पार्षद के बचाव में DC को फटकार लगाने वाली चेयरमैन साहिबा निगमायुक्त के सामने लाचार दिखीं ।
स्टैंडिंग् कमेटी में हुए इस घटनाक्रम से यह साफ हो गया कि निगम के असली मालिक बाबू ही हैं।
सभा कक्ष में मौजूद सत्ता पक्ष और विपक्ष के पार्षद एकदम शांत हो गए।
कक्ष में सन्नाटा छा गया, मानो सबको याद दिला दिया गया हो कि —असली मालिक बाबू हैं,आप लोग नहीं जो पांच साल के लिए चुन कर आते हो.
घटनाक्रम का क्लाइमेक्स अभी बाकी है । बेचारे लूथरा जी के साथ बहुत बुरी हुई । पहले तो भरी सभा मे कमिश्नर साहब पेल कर निकल गए, सूत्रों की माने तो बाद में भाजपा दिल्ली प्रदेश के किसी शीर्ष नेता ने भी उनकी क्लास ली कि उन्होंने बिल्डिंग विभाग का मुद्दा क्यों उठाया। अब ऐसे में जब चुने हुए जनप्रतिनिधियों की यही औकात रह गई कि बाबु लोग उनको ठोक बजाकर निकल जाएं और बेचारे निगम पार्षद पिटे हुए प्यादे की भांति बगले ताकते दिखाई दें ।
अब स्थायी सभा मे गरज रहे बादल भ्र्ष्टाचार के हैं या ईमानदारी के,यह कौन तय करेगा । क्या इनके इलाके में सभी निर्माण कानूनन सही हैं । क्या कमिश्नर साहब को इसकी जांच नही करनी चाहिए,कि निगम पार्षद द्वारा अधिकारी पर लगाये गए आरोप सही हैं यां गलत । लेकिन कमिश्नर साहब अपने अधिकारी के लिए जहां जमकर बेटिंग करते दिखाई दिए । वैसे हमें कमिश्नर साहब की ईमानदारी पर संदेह नही है । निगम भंग होने पर वह स्पेशल ऑफिसर की भूमिका का भी निर्वाहन कर चुके हैं । पर सवाल यह है कि क्या निगम में भ्र्ष्टाचार खत्म हो गया है । क्या उनके अधिकारी दूध के धुले हैं । भृष्टाचारी अधिकारियों की जवाबदेही तो ईमानदार मुखिया से भी बनती है ।

वैसे सार्वभौमिक सत्य यही है कि MCD का असली संविधान ‘रूल बुक’ में नहीं, बल्कि जेब में छुपा है । जेब भरो और कुछ भी करो । हमाम में बाबू और नेता सब नंगे हैं । हर बाबू साहिब का कोई माई बाप भी कोई बड़ा नेता ही होता है, जिसकी शह पर वह फुदकता है । निगम में बैठे बेचारे नेता तो कठपुतली मात्र हैं,सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो ।

