रिटायर होने से पहले क्या पक्के हो जाएंगे मस्टरोल कर्मचारी?”
संदीप शर्मा
दिल्ली नगर निगम में मस्टरोल कर्मचारियों का नियमितीकरण की प्रशासनिक प्रक्रिया बॉलीवुड की किसी सस्पेन्स फ़िल्म से कम नहीं है । नियमतिकरण का आदेश हो चुका है…स्टेंडिंग कमेटी मे बजट भी पास हो चुका है…इस पर नेता सदन प्रवेश वाही का पत्र भी जा चुका है… लेकिन “प्रक्रियाधीन” नियमितीकरण की फाइल आज भी कहीं अटकी हुई है । निगम की भाषा में कहें तो—सब कुछ हो गया है,बस होना बाकी है।

स्थायी समिति से बजट को मंजूरी मिल चुकी है, और नेता सदन प्रवेश वाही बाकायदा निगमायुक्त को पत्र लिखकर कार्रवाई की गुहार भी लगा चुके हैं। इसके बावजूद फाइल ऐसे अटकी है जैसे बाबू की मेज़ पर धूल खाई फाइलें दमे की मरीज़ की तरह ।

मामला 2006 से 2012 के बीच नियुक्त 375 बेलदारों (मस्टरोल कर्मचारियों) का है, जो वर्षों से नियमित होने का इंतजार कर रहे हैं। फरवरी 2026 की बजट बैठक में इस पर अंतिम मुहर भी लग गई और फाइल निगमायुक्त को भेज दी गई। लेकिन लगता है कि निगम के गलियारों में फाइलें चलती कम और घूमती ज्यादा हैं ।

अगर इतिहास के पन्ने पलटें, तो 23 फरवरी 2022 को तत्कालीन विशेष अधिकारी अश्विनी कुमार ने स्पष्ट आदेश जारी कर दिया था कि 11 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2009 तक के कर्मचारियों को नियमित किया जाए। आदेश इतना साफ था कि उसमें कोई “अगर-मगर” की गुंजाइश नहीं थी। लेकिन यह MCD है जनाब, यहां होता वही है जो बाबुशाही चाहती है । इंजीनियरिंग विभाग ने “Uma Devi vs State of Karnataka” केस का हवाला देकर इस फाइल को ऐसे ठंडे बस्ते में डाला कि आज तक वह बस्ता खुला ही नहीं।
वहीं विधि विभाग ने भी साफ कर दिया कि दिल्ली नगर निगम की अपनी नीति है और इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं है। यानी कानून भी रास्ता साफ कर चुका है, लेकिन सिस्टम अभी भी ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ है*—और यह जाम किसी सिग्नल से नहीं, बल्कि फाइलों की भीड़ से बना है।
आज हालत यह है कि जिन कर्मचारियों ने अपनी जवानी निगम को दे दी, वे अब रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े हैं—लेकिन “पक्का” होने का सपना अभी भी अस्थायी ही है। कुछ कर्मचारी 50 पार कर चुके हैं, और डर यह सता रहा है कि 60 की उम्र आते-आते वे बिना नियमित हुए ही सेवानिवृत्त न हो जाएं । यानी नौकरी भी की,इंतजार भी किया, और अंत में मिला—“अस्थायी सम्मान”।
अब बेचारे कर्मचारियों की उम्मीद मौजूदा निगमायुक्त संजीव खिरवार पर टिकी हैं, जिन्होंने हाल ही में कमान संभाली है। कर्मचारियों को उम्मीद है कि शायद नए कमिश्नर इस पुरानी फाइल को नई रफ्तार दें उनकी मझधार में फंसी नैया को किनारे लगा दें ।
सवाल तो पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है—जब आदेश है, बजट है, कानूनी मंजूरी है और जनप्रतिनिधि की सहमति व सिफारिश भी है, तो आखिर अड़चन कहां है ? या फिर यह मान लिया जाए कि दिल्ली नगर निगम में फाइलें भी सरकारी कर्मचारी बन चुकी हैं—जो समय पर काम करने की बजाय “समय काटने” में ज्यादा विश्वास रखती हैं ।
कुल मिलाकर, यह कहानी सिर्फ 375 कर्मचारियों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जहां नियमितीकरण की फाइलें भी स्थायी नहीं हो पातीं—और कर्मचारी इंतजार करते-करते अस्थायी से सीधे रिटायर्ड हो जाते हैं।

